"मैं, तुम और मेरी डायरी"
रोज़-रोज़ तो लिख नहीं पाती,
पर दूर मैं तुमसे रह नहीं पाती
साझा करती तुमसे मैं,
अपनी हर एक सोच,
हर एक समस्या
हर एक उलझन
हर एक परिस्थिति,
मानो जैसे हो जाता, हल्का दिल का बोझ,
तुम तो मेरी डायरी में बस जाते हो...।
मेरे, तुम और मेरी डायरी के,
साझा एहसासों को दर्शाती है,
जहाँ कलम की स्याही से,
दिल की बातें पन्नों पर उतरती हैं।
यह एक ऐसा कोना है,
जहाँ तुम्हारी यादें,
मेरे शब्द और डायरी का मौन,
एक-दूसरे से मिलते हैं।
एक अच्छी याद हो तुम,
बहुत कुछ कहना था तुमसे,
मेरी डायरी के कोरे पन्नों पर,
आज भी बेबाक हो तुम।
शब्द सब मेरे मौन हुए,
जबभी मैंने तुम्हें इस तरह से देखा है,
यूं उलझन में मुझे डाल कर,
तुम इस कदर मुस्कुरा रहे हो,
मेरी डायरी के हर पन्ने पर,
तुम अब भी बस रहे हो ।
दिल की तन्हाई को मेरी डायरी ने ही संभाला है,
तुम्हारे बिना भी, मैंने तुम्हें यहीं तराशा है।
रचनाकार- पल्लवी श्रीवास्तव
ममरखा,अरेराज, पूर्वी चम्पारण (बिहार )


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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