"लिखूं मैं तुझे तुझ जैसा"
लिखूँ मैं तुझे फूल के जैसा,
पर फूल तो हैं मुरझा जाते
तो लिखूँ मैं तुझे नदियों जैसा,
पर नदियों के किनारे बंध जाते
तो लिखूँ मैं तुझे तारों जैसा,
पर तारे टूट के बिखर जाते
तो लिखूँ मैं तुझे चंदा जैसा,
पर चाँद में दाग नज़र आते
तो लिखूँ मैं तुझे तुझ जैसा।
जिसे देख बगीचे खिल जाते,
जिसे देख समंदर भर जाते
जिसे देख सितारे चमक उठते,
और चाँद से उजाले बरस जाते
तो लिखूँ मैं तुझे तुझ जैसा
लिखूँ जो तुझे फूल सा,
तो लफ्ज़ महकने लगते हैं,
तेरी सादगी के आगे,
कुदरत के रंग भी,
फीके पड़ने लगते हैं।
लिखूँ जो तुझे नदियों सा,
तो रूह में एक रवानी आती है,
तू वो प्यास है मेरी,
जिसे देख समंदर को भी हैरानी आती है।
लिखूँ जो तुझे चाँद सा,
तो रातों की तन्हाई, मुकम्मल हो जाए,
तू वो दाग-रहित नूर है,
जिसे देख फलक का,
चाँद भी शर्मिंदा हो जाए।
तुझे कागज़ पर उतारूँ,
तो कलम भी सजदे में झुक जाती है,
तू वो अधूरी सी दुआ है मेरी,
जहाँ आकर मेरी सांसे रुक जाती हैं।
तुझे लिखने की कोशिश में,
मेरी हर कोशिश बेकार हो जाती है,
तू वो अनकहा अल्फाज़ है,
जिसे देख मेरी हर बात अधूरी लगती है।
तो लिखूँ मैं तुझे तुझ जैसा,
जिसे देख मेरी दुनिया सज जाती हैं।
तुझे लिखने के लिए,
शब्द कम पड़ जाते हैं,
तू वो अनकही कहानी है,
जिसे कहने के लिए,
मेरे पास लफ्ज़ नहीं हैं।
तुझे देखने के लिए,
मेरी आँखें तरसती हैं,
तू वो ख्वाब है मेरी,
जिसे देखकर मेरी रातें जागती हैं।
तुझे पाने के लिए,
मेरा दिल बेचैन रहता है,
तू वो मंजिल है मेरी,
जिसे देखकर मेरा सफर,
आसान हो जाता है।
तो लिखूँ मैं तुझे तुझ जैसा,
जिसे देख मेरी जिंदगी,
सार्थक हो जाती है।
रचनाकार- पल्लवी श्रीवास्तव
ममरखा, अरेराज, पूर्वी चम्पारण (बिहार)


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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