बे-सबब अपनों को अपना ग़म सुनाते रह गए,
दिल के अपने ज़ख़्म लेकिन हम छुपाते रह गए।
था नहीं जो भी हमारा, फिर भी जाने क्यों सदा,
लब पे हर महफ़िल में उसका ज़िक्र लाते रह गए।
देखकर हमको वो हँस कर पास से गुज़रा मगर,
हम अकेले बैठ कर हसरत दबाते रह गए।
जिसकी ख़ुशबू से महकता था कभी वीरान दिल,
उनकी यादों से ही हम ख़ुद को जलाते रह गए।
हर दुआ मेरी रही बे-असर लेकिन यहाँ,
फिर भी हम उम्मीद का दीपक जलाते रह गए।
वक़्त ने कर दी जुदा हर राह की मंज़िल मगर,
हम पुराने मोड़ तक रिश्ते निभाते रह गए।
अब भी ख़ामोशी यही पूछती है रात में,
क्यों ज़रूरी बात हम उनसे छुपाते रह गए?


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







