अब तो है जाने क्यूं, नींद कम ख़्वाब कम..
जरूरतें तो हैं मगर, रह गए अहबाब कम..।
बाकी उरोज़-ए-ख़्वाहिश हैं, न उम्मीद-ए-रज़ा..
क्या जहां-ए-बही में, रह गया है हिसाब कम..।
मुर्दा -ए-किस्सा हो गया, कि खूं-ए-रवानी नहीं..
जो मैंदां-ए-सबब है, तो क्यूं है इंकिलाब कम..।
दिल डरता है जो जिक्र भी हो हुस्न का उनके..
वो जो रूबरू हों तो, दिखता है महताब कम..।
वो दर्जा -ए-दोयम दिए हुए हैं, हमको बेवज़ह..
हम हैं नायाब बहुत, और वो हमसे ख़राब कम..।
पवन कुमार "क्षितिज"


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







