ख़तावार था निगाह में उनकी, यही इक ख़ता थी मेरी..
और वो कुछ कहते भी न थे, बड़ी सख्त सज़ा थी मेरी..।
फ़ितरत तो मेरी भी, इक आदमी से ज़ियादा न थी..
तभी कुछ खामियां भी, खुदा की निगाह में वफ़ा थी मेरी..।
मुहब्बत के हर रंग से , हम वाक़िफ हो न सके..
वो लौट के न आए, कैसी बे-असर सदा थी मेरी..।
उनका फैसला भी ज़माने के लिहाज़ जैसा निकला..
और जाने क्यूं उनकी रज़ा में ही, रज़ा थी मेरी..।
मैं इस शहर से, त'अल्लुक़ात बेहतर करता भी कैसे..
मैं भी खो गया, और पहचान भी गुमशुदा थी मेरी..।
पवन कुमार "क्षितिज"


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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