ऐसे घर को भागे जा रहे हैं जहां दो कौड़ी की इज्जत नहीं
जिंदगी ऐसी कि जिसमें दो घड़ी खुशियों की मोहलत नहीं
खारा सागर मेरे पास में पऱ पीने क़ो कतरा नहीं प्यास में
एक बेबसी ये कि अश्क़ो क़ो पी जाने की सहूलियत नहीं
सताने की रुलाने की तड़पाने की सह जाने की भी हद हैं
मेरी बेबसी हैं कि इज़्ज़त में मर जाने कि भी इज़ाज़त नहीं
सबके अपने-अपने दर्द है सबके अपने-अपने अश्रु जानाँ
इसका मतलब ये तो नहीं मेरे दर्द की कोई अहमियत नहीं
शायद ऊपरवाले की किताब में बड़े ख़ुशनसीब हैं कृष्णा
इसीलिए तो झोली में बिखरे दुःखो की कोई किल्ल्त नहीं...
-कृष्णा शर्मा


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







