कितनी आसानी से तबाह हो जाता है,
जख्मों से ही इन्सां जवाँ हो जाता है,
जो करना ही नहीं था फिर भी गुनाह हो जाता है,
लोग ही नहीं लगते हैं इसके लिए,
हर इक घर गवाह हो जाता है,
जो खिलौने से खेला करता था है,
आज उसके ही दिल में घाव हो जाता है,
जख्मों का होना ही उसकी दुआ हो जाती है,
टूटते टूटते ही उसकी सुबह हो जाती है,
ये आँसू ना होते तो पता भी न चलता,
दर्द तो रोज आना जाना जुआ हो जाता,
क्या हो कहाँ हो,
बर्बादी के लिए सबकी ज़रूरत भी नहीं,
एक लक्ष्य मे ही तबाह हो जाता है,
क्या मांगा था तुझसे,
क्या लिया था तेरा,
हर जख्म के लिए उसका नाम तेरी जुबाँ हो जाता है,
क्या हो गया कि तू ख़ुदा है तो,
हर दिल से खेलना तेरे लिए कितना आसां हो जाता है,
वो भी तो सिर्फ जिंदगी छूना चाहता था,
जिसका खुद में ही वज़ूद तबाह हो जाता है,
तू कितना ही कह ले बुलंदी पर जाने को,
एक दिन ऐसा होता है,
कुछ ना ही करना ही एक मुकाम हो जाता है।।
- ललित दाधीच


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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