पौधारोपण पेड़ों को जिंदगी नहीं दे सकता,
जिन पेड़ों को अब तक काटा गया है,
उन्हें इंसाफ चाहिए,
हाँ उनकी तरफ से न्याय कोई नहीं मांगेगा,
क्योंकि वो पौधारोपण करना जानते हैं,
श्रद्धांजलि दे सकते हैं,
पर न्याय की गुहार पेड़ों के लिए,
इतनी स्पष्टता होती तो,
आम लोगों की जिंदगी,
दफ्तरों,
सार्वजनिक फ़ाइलों दबी हुई ना होती,
जिन पर सालों साल की धूल है,
उस धूल को भी इंसाफ चाहिए,
कि उसे साफ नहीं किया गया,
क्योंकि बेरोजगारों नौकरी नहीं मिली,
तो धूल भी भार बनके पड़ी है,
फ़ाइलों की सतह पर,
वो भी मिलना चाहती है,
प्रकृति में, हवा में,
पर उन्हें भी चूहे खा जाएंगे,
तो चूहों को भी इंसाफ चाहिए,
कि उन्हें धूलभरी फाइलें,
लोगों की जिंदगियां,
सरकारी कर्मचारी की गैर-जिम्मेदाराना कर्म,
और वो दबी बेचैन फ़ाइलों को खाना पड़ा,
पर यहाँ इंसाफ की लंबी कतारें,
लंबी तारीखें,
लंबी बयानबाजी हैं,
तो तारीखों को भी इंसाफ चाहिए,
कि उस समय कार्य,
उस समय क्यों नहीं,
अलगी तारीख क्यों,
फिर उन कार्यों को भी इंसाफ चाहिए,
उन फैसलों को भी इंसाफ चाहिए,
फिर उस इंसाफ को भी इंसाफ चाहिए,
कि उसे भी उसकी जिंदगी नहीं जीने दी,
बहुत खूब ना प्रकृति को बख्शा,
ना इंसान, ना चेहरा,
ना जीवन, ना जी,
ना धूल, ना दफ्तर,
ना फाइलें, ना चूहे,
ना तारीख़, ना फैसले,
ना इंसाफ,
और उस अंहकार ,
और अंधेरे को भी नहीं बख्शा जिसे इंसान बढ़ाता ही गया,
किसी को नहीं बख्शा,
किसी को नहीं।
- ललित दाधीच


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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