मन कोमल जलधार सा,
पल में बहे अपार।
पल में बन जाए शिला,
पल में हो लाचार।
कभी शीतल छाँव बने,
कभी धधकती धूप।
कभी स्वयं ही बाँट दे,
जीवन का मधुर स्वरूप।
चंचल पवन के संग-संग,
दिशा-दिशा उड़ जाए।
मृगतृष्णा के मोह में,
स्वयं स्वयं भरमाए।
बिखरे स्वप्नों की डगर,
काँटों से भर जाती।
भटका हर विश्वास फिर,
आहों में ढल जाती।
टकराता चट्टानों से,
लहरों जैसा मन।
हार न माने फिर भी यह,
रचता नव जीवन।
अश्रु बने तो बह पड़े,
हँसे तो फूल खिले।
दुख के घने अँधेरों में,
आशा के दीप जले।
एकाग्रता की ओस जब,
अंतर-वन पर छाए।
विक्षिप्त भावों का धुआँ,
धीरे-धीरे जाए।
संयम की मृदु बाँसुरी,
जब अंतर में बजे।
चंचलता के पंख तब,
मर्यादा में सजे।
भटके पथिक-सा मन भले,
राह नई चुन लेता।
ठोकर की हर वेदना से,
जीने का गुण लेता।
गिरकर फिर उठना सिखे,
यही मन का श्रृंगार।
संघर्षों की आँच में,
निखरे हर व्यवहार।
कोमलता ही शक्ति बने,
धैर्य बने आधार।
मन का निर्मल बहाव ही,
जीवन का विस्तार।
नदियों-सा अविराम रहे,
सत्य-सरल अभियान।
अपने भीतर खोज ले,
शांति, प्रेम, सम्मान।


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







