बीज धरा की गोद में सोता,
मौन समय को धीरे बोता।
बूँद मिली तो प्राण जगे,
नन्हे अंकुर नभ को तके।
कोमल पत्ते हँसते आए,
हरियाली के गीत सुनाए।
धीरे-धीरे पौधा बढ़ा,
जीवन का विश्वास गढ़ा।
शाखाओं ने बाहें फैलाईं,
ऋतुओं संग मुस्कान सजाई।
टहनी पर इक कली सँवरी,
ओस-बूँद से आँखें भरी।
सूरज ने जब किरण बिखेरी,
कली बनी मुस्काती फेरी।
रंग-रंग के पुष्प खिले,
सुगंध बन नभ भरने चले।
भँवरे आए, तितली आई,
प्रकृति ने मधुर तान सुनाई।
पराग मिलन से फल मुस्काया,
बीजों ने फिर जन्म पाया।
फल ने धरती का ऋण चुकाया,
नव जीवन का दीप जलाया।
सूखा पौधा, झुकी डालियाँ,
फिर भी जीवित रहीं कथाएँ।
एक बीज फिर माटी सोए,
नव प्रभात के स्वप्न संजोए।
यही प्रकृति का अमर विधान,
सृजन बने हर एक अवसान।
कली, पुष्प और हरित विटप,
जीवन का अनुपम है स्वरूप।
चक्र यही संदेश सुनाए,
अंत नया आरंभ बन जाए।


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







