जाने ये किस अंधी गली में ले चली है ज़िंदगी
खुशरंग से बदरंग साँचे में ढली है ज़िंदगी
तुम क्या डराओगे इसे शोलों से खारों से यहां
ता उम्र खुद ही एक जहन्नम में पली है ज़िंदगी
जो स्वाद हमने जब चखा तो जाना कड़वी है बहुत
हमने तो सोचा एक गुड़ की ये डली है ज़िंदगी
ऐसे ही इसके चेहरे पे आई नहीं है ये चमक
हाँ एक मुद्दत शोलों में दिल के जली है ज़िंदगी
कितनी यहां रौंदी गई, कितनी यहां मसली गई
जो खिल कभी भी ही न पाई वो कली है ज़िंदगी
जाने ही कितने रूप हैं इसके यहां क्या हम कहें
है ये कभी इतनी बुरी, और फिर भली है ज़िंदगी।
अनमोल


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







