इतनी साफ़ नीयत से जियो
कि जब कर्म लौटकर आएँ,
तो वे सज़ा बनकर नहीं,
ईश्वर का आशीर्वाद बनकर आएँ।
तुम्हारे द्वार पर दस्तक दें
कुछ भूली हुई मुस्कानें,
कुछ अनजानी दुआएँ,
कुछ ऐसे हाथों की प्रार्थनाएँ
जिन्हें कभी तुमने थाम लिया था।
कर्म कभी रास्ता नहीं भूलते,
वे लौटते हैं—
समय की लंबी यात्राएँ करके,
भाग्य की अनेक गलियाँ पार करके।
इसलिए इतना उजला मन रखना
कि लौटते हुए कर्मों को देखकर
तुम्हारी आत्मा कह उठे—
“स्वागत है,
मैंने तुम्हें प्रेम से ही विदा किया था।”
जिस दिन संसार तुम्हें समझ न पाए,
उस दिन भी कटु मत होना,
क्योंकि कड़वाहट बोकर
मिठास की फसल नहीं उगती।
तुम बस अपने हिस्से की नेकी करते रहना,
जैसे नदी बहती है,
बिना यह गिने कि
किसने उसका जल पिया
और किसने उसे पत्थर मारे।
क्योंकि अंत में
ईश्वर कर्म नहीं गिनता केवल,
वह नीयत भी पढ़ता है।
और नीयत वह भाषा है
जिसे शब्दों की ज़रूरत नहीं होती।
इसलिए इतना निर्मल हृदय रखना
कि जब जीवन की अंतिम साँझ उतरे,
तो पछतावे की कोई छाया न हो,
बस एक शांत मुस्कान हो।
और आत्मा धीरे से कहे—
“मैंने किसी का हक़ नहीं छीना,
मैंने किसी का विश्वास नहीं तोड़ा,
मैंने जहाँ तक बन पड़ा प्रेम बाँटा,
अब जो लौटकर आएगा,
वह मेरा अपना ही प्रकाश होगा।”
तब कर्मों का नाम सुनकर
डर नहीं लगेगा,
क्योंकि डर पाप का पुत्र है,
और सुकून
साफ़ नीयत की संतान।


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







