मैंने तुझे
बहुत भीतर से चाहा था—
इतना पास
कि तेरी धड़कन
मेरी चुप्पी का हिस्सा बन गई।
फिर भी
हमारे बीच कुछ था।
न कोई दीवार,
न कोई दूरी,
न कोई दूसरा—
बस मैं।
तू हर बार
मेरे भीतर उतरता रहा,
और मैं
हर बार तुझे
अपना कहकर
तुझसे थोड़ा और
दूर होता गया।
मैंने तेरे आगे
सिर झुका दिया,
पर अपना ‘मैं’
तेरे चरणों में
न रख सका।
वह मेरी मुट्ठी में
नाख़ून-सा
गड़ा रहा,
और मैं चुपचाप
अपने ही ख़ून का
स्वाद पीता रहा।
अब समझ आया है—
मिलन में बाधा
कोई विरह नहीं होता,
प्रेमी का ‘होना’ होता है।
तू मेरे भीतर
कभी आया ही नहीं—
क्योंकि मैं ही
अपने होने की देहरी पर
ताले की तरह
लटका रहा।
अब जब तू पुकारे,
तो मेरा नाम मत लेना—
नाम लेते ही
मैं लौट आता हूँ।
बस अपनी ख़ामोशी भेज देना,
मैं उसे पहचान लूँगा।
और जिस दिन
तेरी ख़ामोशी में भी
मेरा कोई निशान न बचे—
समझना,
उस दिन
तेरे और मेरे बीच
मैं नहीं रहा।
शायद उसी दिन
प्रेम पूरा होगा—
जब तू रहेगा,
और तुझे चाहने वाला
कोई
मैं नहीं।
— इक़बाल सिंह ‘राशा’
मनिफिट, जमशेदपुर, झारखण्ड


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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