वन की शांत गोद में,
एक बालक पलता था,
धनुष-बाण के स्वप्नों से,
मन उसका जलता था।
राजगुरु द्रोणाचार्य से,
ज्ञान पाने की चाह थी,
धनुर्विद्या के पथ पर,
उसकी अटूट राह थी।
गुरु ने जब स्वीकार न किया,
वह वन लौटकर आया,
मिट्टी से गुरु की प्रतिमा,
श्रद्धा से उसने बनाया।
मूर्ति को गुरु मानकर,
नित साधना करता था,
लक्ष्य सामने रखकर,
अभ्यास निरंतर करता था।
न राजमहल की सुविधा थी,
न शस्त्रों का भंडार,
केवल श्रम, संकल्प, साधना,
और हृदय में प्यार।
अंगुलियों पर छाले थे,
पर मन में विश्वास,
अंधकार को चीर रहा था,
उसका दृढ़ प्रयास।
पत्तों की सरसराहट में,
लक्ष्य की ध्वनि सुनता था,
चलते हुए पशु के पग को,
क्षण में पहचानता था।
जब अर्जुन ने देखा उसको,
चौंक उठा संसार,
वनवासी के बाणों में था,
अद्भुत तेज अपार।
तब गुरु-दक्षिणा माँगी गई,
गुरु ने माँगा अंगूठा,
क्षण भर भी वह डिगा नहीं,
न बदला उसका जज़्बा।
हँसकर उसने काट दिया,
अपने हाथ का मान,
गुरु के चरणों में रख दिया,
अपना प्रिय बलिदान।
न उसने कोई प्रश्न किया,
न मन में रोष जगाया,
गुरु-भक्ति की अग्नि में,
स्वयं को उसने तपाया।
उसकी कथा बताती है,
ज्ञान नहीं अधिकार,
साधक की सच्ची निष्ठा ही,
करती जीवन पार।
गुरु केवल वह नहीं,
जो शब्दों का पाठ पढ़ाए,
गुरु वह भी है, जो जीवन में,
कर्तव्य-बोध जगाए।
ज्ञान अगर दीपक है,
श्रद्धा उसकी बाती,
श्रम यदि उसका तेल बने,
जीत बने दिन-राती।
एकलव्य ने सिद्ध किया,
मन में हो यदि आग,
दुर्गम पथ भी झुक जाता,
मिट जाता हर भाग।
पर इतिहास यह भी पूछे,
न्याय कहाँ था उस क्षण?
क्या प्रतिभा का मूल्य सदा,
हो सकता है केवल समर्पण?
गुरु-भक्ति महान सही,
पर न्याय रहे आधार,
हर प्रतिभा को अवसर मिले,
यही सभ्यता का सार।
एकलव्य का त्याग हमें,
सच्चा पाठ पढ़ाता है,
ज्ञान तभी पावन होता,
जब सबको आगे लाता है।
गुरु का सम्मान हृदय में हो,
ज्ञान बने हथियार,
श्रम, संयम, सद्बुद्धि से,
जीवन हो साकार।
एकलव्य की अमर गाथा,
आज यही समझाती—
गुरु-ज्ञान का दीप जलाकर,
मानवता बढ़ती जाती।
निष्ठा हो तो पर्वत टूटे,
श्रम से बदले भाग्य,
ज्ञान मिले तो बाँटो जग में,
यही मनुष्य का सौभाग्य।
गुरु-दक्षिणा का अर्थ यही हो,
गुरु-वचन का मान,
ज्ञान-ज्योति से जग रोशन हो,
यही सच्चा सम्मान।
एकलव्य के त्याग से,
युग को मिला संदेश—
प्रतिभा का सम्मान करो,
ज्ञान बने सर्वदेश।
श्रद्धा, श्रम और साधना से,
जीवन हो उजियार,
गुरु और शिष्य की पावनता,
रखे जगत सदा साकार।


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







