Dastan-E-Shayara By Reena Kumari Prajapat

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The Flower of WordThe Flower of Word by Vedvyas Mishra
The Flower of WordThe novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas MishraThe Flower of Word by Vedvyas Mishra
Dastan-E-Shayara By Reena Kumari Prajapat

Dastan-E-Shayara By Reena Kumari Prajapat

The novel 'Nevla' (The Mongoose), written by Vedvyas Mishra, presents a fierce character—Mangus Mama (Uncle Mongoose)—to highlight that the root cause of crime lies in the lack of willpower to properly uphold moral, judicial, and political systems...The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra

कविता की खुँटी

                    

एकलव्य

वन की शांत गोद में,
एक बालक पलता था,
धनुष-बाण के स्वप्नों से,
मन उसका जलता था।

राजगुरु द्रोणाचार्य से,
ज्ञान पाने की चाह थी,
धनुर्विद्या के पथ पर,
उसकी अटूट राह थी।

गुरु ने जब स्वीकार न किया,
वह वन लौटकर आया,
मिट्टी से गुरु की प्रतिमा,
श्रद्धा से उसने बनाया।

मूर्ति को गुरु मानकर,
नित साधना करता था,
लक्ष्य सामने रखकर,
अभ्यास निरंतर करता था।

न राजमहल की सुविधा थी,
न शस्त्रों का भंडार,
केवल श्रम, संकल्प, साधना,
और हृदय में प्यार।

अंगुलियों पर छाले थे,
पर मन में विश्वास,
अंधकार को चीर रहा था,
उसका दृढ़ प्रयास।

पत्तों की सरसराहट में,
लक्ष्य की ध्वनि सुनता था,
चलते हुए पशु के पग को,
क्षण में पहचानता था।

जब अर्जुन ने देखा उसको,
चौंक उठा संसार,
वनवासी के बाणों में था,
अद्भुत तेज अपार।

तब गुरु-दक्षिणा माँगी गई,
गुरु ने माँगा अंगूठा,
क्षण भर भी वह डिगा नहीं,
न बदला उसका जज़्बा।

हँसकर उसने काट दिया,
अपने हाथ का मान,
गुरु के चरणों में रख दिया,
अपना प्रिय बलिदान।

न उसने कोई प्रश्न किया,
न मन में रोष जगाया,
गुरु-भक्ति की अग्नि में,
स्वयं को उसने तपाया।

उसकी कथा बताती है,
ज्ञान नहीं अधिकार,
साधक की सच्ची निष्ठा ही,
करती जीवन पार।

गुरु केवल वह नहीं,
जो शब्दों का पाठ पढ़ाए,
गुरु वह भी है, जो जीवन में,
कर्तव्य-बोध जगाए।

ज्ञान अगर दीपक है,
श्रद्धा उसकी बाती,
श्रम यदि उसका तेल बने,
जीत बने दिन-राती।

एकलव्य ने सिद्ध किया,
मन में हो यदि आग,
दुर्गम पथ भी झुक जाता,
मिट जाता हर भाग।

पर इतिहास यह भी पूछे,
न्याय कहाँ था उस क्षण?
क्या प्रतिभा का मूल्य सदा,
हो सकता है केवल समर्पण?

गुरु-भक्ति महान सही,
पर न्याय रहे आधार,
हर प्रतिभा को अवसर मिले,
यही सभ्यता का सार।

एकलव्य का त्याग हमें,
सच्चा पाठ पढ़ाता है,
ज्ञान तभी पावन होता,
जब सबको आगे लाता है।

गुरु का सम्मान हृदय में हो,
ज्ञान बने हथियार,
श्रम, संयम, सद्बुद्धि से,
जीवन हो साकार।

एकलव्य की अमर गाथा,
आज यही समझाती—
गुरु-ज्ञान का दीप जलाकर,
मानवता बढ़ती जाती।

निष्ठा हो तो पर्वत टूटे,
श्रम से बदले भाग्य,
ज्ञान मिले तो बाँटो जग में,
यही मनुष्य का सौभाग्य।

गुरु-दक्षिणा का अर्थ यही हो,
गुरु-वचन का मान,
ज्ञान-ज्योति से जग रोशन हो,
यही सच्चा सम्मान।

एकलव्य के त्याग से,
युग को मिला संदेश—
प्रतिभा का सम्मान करो,
ज्ञान बने सर्वदेश।

श्रद्धा, श्रम और साधना से,
जीवन हो उजियार,
गुरु और शिष्य की पावनता,
रखे जगत सदा साकार।




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रचना के बारे में पाठकों की समीक्षाएं (7)

+

सुप्रिया साहू said

वाह....एकलव्य की गाथा अपरम्पार है, द्रोणाचार्य के जैसा गुरु और एकलव्य के जैसा शिष्य इस दुनिया में शायद ही जन्म लिया हो, बहुत खूबसूरत रचना सर 👌👌, आपको सादर प्रणाम 🙏🙏।

ममता तिवारी said

बहुत सुंदर रचना काबिले तारीफ बहुत खूबसूरत बेहतरीन लाजवाब ज्ञानवर्धक प्रस्तुति लाजवाब काफी सुंदर सर जी 🙏🙏👌👌बहुत सुंदर लगी रचना 🙏🙏

सरिता पाठक said

अति सुन्दर रचना 👌आदरणीय सर जी को सादर प्रणाम 🙏

मनोज कुमार सोनवानी "समदिल" said

अतिसुंदर अतिसुंदर अतिसुंदर 👌👌🙏🙏 रचना की जितनी तारीफ करें,कम है।सहज सरल और हृदय तक पहुंचने वाली भाषा में आपने एकलव्य की गुरुभक्ति, साधना, तपस्या और धनुर्विद्या हासिल करने की जिद को मानस पटल पर प्रभावी चित्रण किया है। गुरु दक्षिणा में अंगूठा मांगना, अवश्य एक प्रश्न है जो वर्तमान हमेशा इतिहास से पूछता रहेगा पर जवाब तो समय समय पर समय ही देता रहेगा। रचना के भाव और कला सौंदर्य के लिए आपको हृदय की गहराई से बधाई।सादर सुप्रभात!! आप इसी तरह रचनाओं का सृजन करते रहें।

कृष्णा शर्मा said

बहुत ही खूबसूरत आपने एकलव्य की गाथा पऱ लिखा है, एकलव्य के जैसा शिष्य इस दुनिया में क़ोई हों नहीं सकता,बहुत खूबसूरत रचना👏👏
आपको सादर प्रणाम 🙏🙏।

वन्दना सूद said

बेहद शानदार लाजवाब प्रस्तुति 👌👌👏👏🙏🙏प्रेरणादायक रचना

रीना कुमारी प्रजापत 'मनस्वी' said

लाजवाब बेमिसाल👌👌🙏 सादर प्रणाम आपको

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