जब मेरी साँसों की लौ
काँपने लगे,
उसे बुझाना मत—
बस हवा को इतना धीमा कर देना
कि वह स्वयं
रात में घुल जाए।
जब मेरी आँखों में
आकाश का आख़िरी रंग बचे,
उसे किसी चित्र की तरह
दीवार पर मत टाँगना—
उसे शाम की नदी में
चुपचाप बह जाने देना।
मैं मृत्यु से
कुछ माँगना नहीं चाहता—
न कोई और सुबह,
न लौटती हुई कोई ऋतु।
बस इतना करना:
जब मेरा नाम
धीरे-धीरे
लोगों की स्मृति से उतरने लगे,
उसे किसी सूखे पत्ते की तरह
मिट्टी में मिला देना।
मैंने उम्र भर
अपने भीतर
एक नदी रोकी है।
अब जब बाँध टूटे,
तो उसे रास्ता मत दिखाना—
उसे समुद्र तक
अपने ढंग से
पहुँच जाने देना।
मेरे हाथों की
जो आख़िरी गर्मी बचे,
उसे किसी अकेले पत्थर पर
धूप की तरह रख देना,
ताकि मैं
पत्थर होकर भी
किसी की हथेली में
थोड़ी देर ठहरा रहूँ।
और जब मेरी आवाज़
किसी अधूरी कविता में
काँपे,
तो उसे पूरा मत करना—
कुछ शब्द
अधूरे ही रहने देना,
जैसे बादल
बरसने के बाद भी
आकाश में
थोड़ी नमी छोड़ जाते हैं।
मैं चाहता हूँ,
मृत्यु आए
तो द्वार खटखटाए नहीं—
वह मेरे भीतर
पहले से बहती
किसी शांत नदी की तरह आए,
और मैं
अपने किनारे छोड़कर
उसमें उतर जाऊँ।
न कोई शोर,
न कोई विदाई,
न लौटने की इच्छा—
बस एक मौन
जो मुझे
मुझसे ही मुक्त कर दे।
मैं मिटूँ
तो केवल मिट्टी में नहीं,
उस मौन में मिलूँ
जहाँ से
पहली बार
मेरी साँस आई थी।
और यदि कहीं
उस पार भी
कोई आकाश हो,
तो मुझे वहाँ
पंछी बनाकर मत भेजना—
मैं इस बार
आकाश ही हो जाना चाहता हूँ।
— इक़बाल सिंह ‘राशा’
मनिफिट, जमशेदपुर, झारखण्ड


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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