मत झुको—
झुकना सिर्फ़ देह का नहीं,
अस्तित्व का परित्याग है।
मत थमो—
ठहराव अक्सर
जीवन के विरुद्ध रचा गया
एक मौन षड्यंत्र है।
ये संसार—
हर दिशा में ‘मत’ लिखता है,
हर इच्छा पर पहरा बिठाता है,
हर उड़ान को नियमों की बेड़ियाँ देता है।
पर तुम—
इन सब ‘मतों’ के अंधकार में
अपनी एक ‘हाँ’
दीपक की तरह बचाए रखना।
कविता—
कोई विद्रोह नहीं,
पर हर विद्रोह से पहले की
वह गहरी खामोशी है,
जहाँ शब्द भी
अपने अर्थों से निर्वस्त्र होकर
साष्टांग लेट जाते हैं।
मैं हँसता नहीं—
सत्य कभी मनोरंजन नहीं होता।
जीवन—
वह पीड़ा है
जो मुस्कान के वस्त्र में भी
भीतर-भीतर रक्त रिसाती है,
वह सन्नाटा है
जो हर शोर के गर्भ में
अपना अनंत विस्तार बुनता है।
तो बताओ—
क्या तुम उतर सकते हो
उस शून्य में,
जहाँ पीड़ा भी
अपने भार से थककर
निःशब्द हो जाती है?
यदि नहीं—
तो याद रखना:
न समय तुम्हें बिखेरेगा,
न हवाएँ उड़ाएँगी—
तुम्हारी हार
कोई दृश्य नहीं होगी,
बल्कि यह कि तुम
चुपके से
अपनी ही रिक्तता में
ऐसे विलीन हो जाओगे
जैसे अंधेरा
अंधेरे में।
-इक़बाल सिंह ‘राशा’
मनिफिट, जमशेदपुर, झारखण्ड


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







