वो मुझ को मिटा के खुद को बचाने चले हैं
क्या पता उनको हम खुद ठोकर खाने चले हैं,
इन पंछी, पर्वत-पहाड़ को वो झुकाने चले हैं इस नील गगन को वो, फिर से खाने चलें हैं,
इस धरा की शक्ति को वो बचकाने चले हैं,
खुद से दुश्मनी कर अपनों को खाने चले है,
जाल पड़ गया है बुद्धि पर उस मनुष्य की,
जाल में फंस कर अपनी बुद्धि खाने चले हैं,
क्या होगा अब इस संसार का प्रिय सुप्रिया,
ये रीति सबको मारकर खाने चले हैं...।।
- सुप्रिया साहू


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







