गिरगिट से बदलते रंग
चुनावों की बेला आई,
फिर मुस्कानों की छाँव आई।
हाथ जोड़कर घर-घर आए,
मीठे सपनों के दीप जलाए।
हर पीड़ा अपनी बतलाई,
हर चौखट पर प्रीत सजाई।
वादा था हर घाव भरेंगे,
सूखे आँगन फूल करेंगे।
जनता ने विश्वास जताया,
मत का अमृत दान चढ़ाया।
कुर्सी का जब ताज मिला,
बदल गया फिर सारा सिलसिला।
राहें सब वीरान हुईं,
आशाएँ हैरान हुईं।
जो कल अपने कहलाते थे,
आज नज़र भी न आते थे।
रंग बदलते देख समय का,
याद आया गिरगिट का ढंग।
बातों में थे पर्वत ऊँचे,
कर्म रहे क्यों इतने नीचे?
जन-सेवा का लिया सहारा,
स्वार्थ बना फिर एक किनारा।
लोकतंत्र की यही पुकार—
जागे हर मतदाता इस बार।
वोट अमानत, वोट विश्वास,
मत होने दो इसका ह्रास।
नेता वही महान कहाए,
जो वचनों को कर्म बनाए।
जनहित जिसका सच्चा धर्म,
वही करेगा राष्ट्र का कर्म।


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







