कभी प्यासे का जल,
कभी नीलकंठ का हलाहल लगती हो,
कभी केसर की फसल तो कभी संगमरमर का महल लगती हो,
सच कहता हूं तुम हर रोज एक मुकम्मल गजल लगती हो।
---- कमलकांत घिरी

Dastan-E-Shayara By Reena Kumari Prajapat

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The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
कभी प्यासे का जल,
कभी नीलकंठ का हलाहल लगती हो,
कभी केसर की फसल तो कभी संगमरमर का महल लगती हो,
सच कहता हूं तुम हर रोज एक मुकम्मल गजल लगती हो।
---- कमलकांत घिरी
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