कोई ज़हर ही पीला दे या रब्बा,सुकून तो आए ज़रा
मैं तरस गई हूँ मौत क़ो कोई गहरी नींद सुलाये ज़रा
अब तो मुझें अश्क़ अपने दर्द कि दुहाई देने लगे हैं
या थाम ले हमकों या अपने संग बहा ले जाए ज़रा
नींद खा गए ग़म मेरे, चेहरे के नूर क़ो खा गई पीड़ा
अब अधमरी लाश हूँ हों सके तो कोई अपनाये ज़रा
सुःख नसीब में नहीं लिखा या फिर मैं लायक नहीं?
कहाँ मुझसें चूक हुई,ख़ुदा अब तो तू बतालाये ज़रा
दुःख काटे नहीं जाते सब्र ख़त्म होने की कगार पऱ हैं
"कृष्णा" की टूटती इन साँसों क़ो कोई दफनाये ज़रा
-कृष्णा शर्मा


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







