दुःख
किसी के द्वार का पता नहीं पूछता,
न ही यह देखता है
कि किसके सिर पर मुकुट है
और किसके हाथ में रोटी का आख़िरी टुकड़ा।
यह चुपचाप आता है,
समय की तरह—
बिना दस्तक,
बिना परिचय।
जिसने महलों में जीवन बिताया,
उसकी आँखों में भी
एक अनकहा समुद्र होता है;
और जिसने झोपड़ी में जन्म लिया,
उसके सपनों में भी
आकाश उतना ही विशाल होता है।
दुःख का कोई धर्म नहीं,
कोई जाति नहीं,
कोई ऊँच-नीच नहीं।
यह मनुष्य होने की
सबसे मौन पहचान है।
किंतु
दुःख केवल आँसू नहीं होता,
वह भीतर जलता हुआ
एक दीप भी है,
जो अहंकार की परतों को पिघलाकर
आत्मा का चेहरा दिखा देता है।
विपत्तियाँ
जब जीवन की शाखाओं को झकझोरती हैं,
तभी विश्वास की जड़ें
धरती में और गहरी उतरती हैं।
जो टूटकर भी
दूसरों की पीड़ा समझने लगे,
वही मनुष्य
अपने भीतर का सबसे सुंदर रूप पा लेता है।
सुख
यदि जीवन का उत्सव है,
तो दुःख
उस उत्सव का अर्थ है।
सुख हमें हँसना सिखाता है,
पर दुःख
हमें मनुष्य होना सिखाता है।
इसलिए
दुःख से मत डरिए,
उससे मत भागिए।
उसका हाथ थामकर
थोड़ी दूर चलिए—
वहीं कहीं
धैर्य आपका इंतज़ार कर रहा होगा,
संतुलन आपकी राह देख रहा होगा,
और आत्मबल
आपके भीतर
एक नए सूर्योदय की तरह जन्म ले रहा होगा।
याद रखिए—
जीवन की परिपक्वता
सुख की ऊँचाइयों से नहीं,
दुःख की गहराइयों से जन्म लेती है।
जब मन
सुख और दुःख—दोनों के बीच
निर्विकार खड़ा रहना सीख जाता है,
तभी जीवन
अपने सबसे सुंदर अर्थ में
प्रार्थना बन जाता है।
और तब
दुःख शत्रु नहीं रहता—
वह गुरु बन जाता है।


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







