दरारन भीतर झाँकते, जग की यही रीत।
खुला द्वार जो देखिया, पूछे नाहीं प्रीत॥
बंद किवाड़न पूछते, भीतर कौन निवास।
खुला द्वार सूना मिला, न कोई पूछे पास॥
दूजे घर की पीर को, सबने खूब निहारा।
अपने भीतर झाँकिए, कौन बचा बेचारा॥
दीवारन की दरार में, जग खोजत संसार।
मन की टूटी ईंट को, पूछे न एक बार॥
दुखिया बैठा देहरी, आँखिन नीर समाय।
आवत-जावत लोग सब, कोई हाल न जाय॥
घर खुला तो धूप आई, छाँव न आई साथ।
जग ने देखा आँगना, न देखा मन की रात॥
जिस घर भीतर मौन है, वहाँ शब्द मत ढूँढ़।
बैठ कछू पल पास तू, पीर स्वयं ले बूझ॥
रिश्ता वह जो दर्द को, अपना दर्द बनाए।
बिन बोले जो बात को, आँखिन से पढ़ जाए॥
झाँकन वाले बहुत हैं, थामन वाला एक।
दरिया देखा दूर से, कौन उतरे भेद॥
दरवाज़ा तू बंद कर, जग से बैर न मान।
सच्चा अपना आए जब, खुल जाए पहचान॥
मत गिन उसकी दरार तू, मत देख उसकी हार।
क्या जाने उस मौन में, पलता हो संसार॥
अखिल कहता प्रेम से, मन मत रखना खोट।
टूटा मन जो जोड़ दे, वही सगा और ओट॥
दरवाज़ा खुला रखो, पर मन रखना जान।
जो भीतर सम्मान दे, उसको देना स्थान॥
दरारन में मत झाँकिए, दीपक बनकर आइए।
जिस घर में अँधियार हो, प्रेम-ज्योति जलाइए॥
डॉ. अखिलेश श्रीवास्तव


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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