चकाचौंध के पार
आँखों में सपनों की बिजली भर,
हथेलियों में शीशे का सूरज रख
इंसान दौड़ा जा रहा है,
दमकती सड़कों पर,
जहाँ हर मोड़ पर
रौशनी उसे बुलाती है
और परछाईं पीछे छूट जाती है।
सोने-सी हँसी ओढ़कर
वह लोहे-सा कठोर होता गया,
मुस्कानें सजावटी दीप बन गईं,
दिल की देहरी अँधेरी रह गई।
महलों की ऊँचाई नापते-नापते
उसने झोपड़ी के आकाश को भूल गया,
जहाँ कभी तारे
बिना कीमत चमकते थे।
रिश्ते तराजू पर रखे गए,
नफा-नुकसान के बाट तौले गए,
ममता सिक्कों में ढल गई,
संवेदना काग़ज़ी नोट बनी।
जिस हाथ ने सहारा माँगा,
वह हाथ अब लाभ की रेखाएँ
गिनने में उलझा रहा।
चमकती परतों के नीचे
खोखलापन साँस लेता रहा,
शोर में दब गई आत्मा की आवाज़,
भीड़ में अकेलापन और गहरा हुआ।
हर दिन नया मुखौटा बदला,
पर चेहरे की झुर्रियों में
थकान ही स्थायी रही।
पृथ्वी ने पुकारा—
“मेरी गोद में अभी भी हरियाली है,”
पर मानव ने कंक्रीट के ताज पहन
उसकी धड़कन को दबा दिया।
नदियाँ शीशे-सी चमकती रहीं,
पर प्यासे होंठों को
स्वच्छ जल न मिला।
वह ऊँचाइयों पर पहुँचा,
जहाँ हवा पतली थी
और साँसें महँगी।
नीचे छूट गए वे पल
जहाँ सादगी की छाया में
मन विश्राम करता था।
जितना उसने बटोरा,
उतना ही भीतर रिक्त हुआ,
जितना चमका बाहर,
उतना अँधेरा भीतर पनपा।
दमक का यह उत्सव
क्षणिक आतिशबाज़ी सा था,
जो बुझते ही
धुएँ की गंध छोड़ गया।
अब भी समय है—
शीशे के सपनों को
मिट्टी की खुशबू से बदलने का,
आँखों की चमक को
दिल की रोशनी बनाने का।
क्योंकि सच्ची उजास
वह नहीं जो दिखे,
वह है जो
मनुष्य को मनुष्य बनाए।


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







