कभी-कभी
मन इतना भर जाता है
कि शब्द
अपने ही भीतर टूटने लगते हैं।
तब होंठ चुप रहते हैं,
पर आँखें
धीरे-धीरे सब कह जाती हैं।
कुछ दर्द ऐसे होते हैं
जिन्हें किसी से बाँटा नहीं जाता,
बस रात की तन्हाई में
तकिया चुपचाप सुनता रहता है।
मैंने भी
कई बार मुस्कुराहट ओढ़कर
अपने भीतर के तूफ़ानों को
दुनिया से छुपाया है।
कितने अपने थे,
जो पास होकर भी दूर रहे,
और कितनी यादें थीं
जो छोड़कर भी साथ रहीं।
आज भी
कुछ आवाज़ें दिल में गूंजती हैं—
माँ की पुकार,
किसी अपने की हँसी,
और वह अधूरी बातें
जो समय छीन ले गया।
इन सबके बीच
मेरी ख़ामोशियाँ
मुझसे बातें करती रहीं।
वह पूछती हैं—
“इतना सब सहकर भी
तुम टूटे क्यों नहीं?”
मैं क्या जवाब दूँ…
शायद इसलिए
क्योंकि उम्मीद अभी ज़िंदा है,
क्योंकि प्रेम अभी मरा नहीं,
क्योंकि भीतर कहीं
एक छोटा-सा दीपक
अब भी जल रहा है।
अब समझ आया है—
सबसे गहरी आवाज़
शब्दों की नहीं होती,
वह उन ख़ामोशियों की होती है
जो चुप रहकर भी
रूह को भिगो देती हैं।


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







