बहुत रोए हैं तन्हाई में छुप कर,
ज़रा अब मुस्कुरा कर देखते हैं।
जो ठहरे थे वो दिल का साया थे,
मुसाफ़िर तो बहाना देखते हैं।
कठिन राहें थीं, टेढ़े रास्ते थे,
चलो, हम लौट कर क्या देखते हैं।
पराई आस में कब तक जिएँ हम,
ख़ुद अपनी आँख में अब देखते हैं।
नदी बनना नहीं मंज़ूर हमको,
ये पानी क्यूँ बहता देखते हैं।
इन्हें रोके कोई आवारा आँसू,
ये ख़्वाबों को झुलसता देखते हैं।
निगाहों को किसी की धुन लगी है,
ये रस्ते को अकेला देखते हैं।
मुक़ाबिल आईना रखने से क्या हो,
हम इन आँखों में दुनिया देखते हैं।
गली में रात फिर रोने लगी है,
सहर का ख़्वाब झूठा देखते हैं।
चले जाते हैं जो इस मोड़ से आगे,
वो कब पीछे का मन्ज़र देखते हैं।
परिंदे उड़ गए सूनी हवेली से,
दर-ओ-दीवार रोता देखते हैं।
भुला कर सारी बातें ऐ 'ललित' अब,
उसे हम ख़ुद से जुदा कर देखते हैं।
- ललित दाधीच


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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