आज की जिंदगी अजीब दौड़ बन चुकी है जिसमें हम सब भाग तो रहे हैं लेकिन रुककर कभी यह नहीं सोचते कि आखिर जाना कहां है सुबह आंख खुलते ही फोन की स्क्रीन हमारा चेहरा देखती है और रात को सोने से पहले भी आखिरी नजर उसी पर जाती है दिन भर काम निपटाते-निपटाते हम जिंदगी टालते रहते हैं और सोचते हैं कि असली जीना तो बाद में करेंगे कभी समय मिलेगा तब हंसेंगे कभी फुर्सत होगी तब अपने लोगों से दिल खोलकर बात करेंगे लेकिन वह कभी नहीं आता हम हर रोज रोटी कमाते हैं पर सुकून खोते जाते हैं हम घर बनाते हैं पर उसमें बैठने का समय नहीं मिलता हम दोस्तों की लिस्ट बढ़ाते हैं पर दिल की बातें कहने वाला कोई नहीं बचता थकान शरीर में कम और दिमाग में ज्यादा रहती है छुट्टी के दिन भी आराम नहीं होता क्योंकि दिमाग को रुकना आता ही नहीं हमने चीजें खरीदना सीख लिया है पर खुशी महसूस करना भूल गए हैं हम तस्वीरें खींचते बहुत हैं पर पल जीते कम हैं हम भविष्य बनाने में इतने व्यस्त हैं कि वर्तमान हाथ से फिसलता जा रहा है कभी बचपन याद आता है जब बिना वजह हंसी आ जाती थी और बिना डर नींद आ जाती थी आज सब कुछ है फिर भी कुछ कमी सी रहती है शायद हम जिंदगी को आसान बनाने निकले थे और उसे जरूरतों का जंगल बना बैठे असल में जिंदगी भागने से नहीं ठहरने से मिलती है कभी अपने आप से भी मिल लिया करो क्योंकि दुनिया से मिलते-मिलते इंसान खुद से दूर हो जाता है और सबसे बड़ी हार यही होती है कि इंसान सब कुछ पा ले लेकिन खुद को खो दे...
कवि प्रशांत सोऊ जोधपुर राजस्थान
द्वारा रचित📝📝


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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