फ़िर कोई दिल-फ़रेब ख़बर थी, अख़बार में..
जान बसती जाती थी, हर एक इश्तिहार में..।
लूट लेने की तमन्नाओं का, हुजूम सा लगा है..
क्या फ़र्क पड़ता है, हुज़ूर किश्त-ए-दो-चार में..।
महंगाई कनखियों से, ताकती है दरवाज़े पर..
मग़र हमें तो मिल रही है, हर चीज़ उधार में..।
बाज़ार के उतार चढ़ाव का, हम पे असर कहाँ..
जो होना है होगा, क्या रखा है चीख-पुकार में..।
कभी न कभी तो अपनी, बारी आएगी साहब..
हम आपके पीछे ही खड़े हैं, लंबी सी कतार में..।
पवन कुमार "क्षितिज"


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







