मैं अपने, और वक़्त अपने हिसाब चला..
दो कदम हकीकत, चार कदम ख़्वाब चला..।
हम अंधेरों की बस्तियों में, उजालों की हाट लगाए..
इंतज़ार करते रह गए, धुंधलका ओढ़े आफ़्ताब चला..।
ज़माने की निगाहों में तो, सब ग़ुनाह पोशीदा रखे..
मगर ना जाने क्यूं, साथ हमारे कोई अज़ाब चला..।
उम्र यूं गुज़ारी कि, दामन अपना सदा बेदाग़ रहा..
फिर वज़ह क्या कि, सिलसिला-ए-इज़्तिराब चला..।
ज़मीं ने जाने क्या कहा, कि आसमां मायूस हो गया..
हम भी सुन न सके, जाने क्या सवाल ज़वाब चला..।
कब तक सुस्ताएंगी, ये उनींदी सी नई नस्लें अपनी..
जाने कौन वक्त था जब, दौर–ए–इंक़िलाब चला..।
कि बदल जाएंगे अबकी, तेरे हाल–ओ–जार सब "क्षितिज"
ये फ़रेब दिखाकर देखिए, फिर कोई इंतिख़ाब चला..।
-पवन कुमार "क्षितिज"


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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