'बात हजम नहीं हुई, ज़माना गुज़रा,
तुमसे मिले, फिर क्या हुआ कि मैं सब छोड़कर चला गया,
और तुम रुके औरों को लाए, साथ मुझे जाने के लिए तैयार हुए,
फिर याद किए, तस्वीर रखी, फिर नाम रहा,
अब भूल गए, अब जैसे हुआ ही नहीं,
नहीं, मैं अपने हिसाब से जाऊँगा,
चाहे मैं ख़ुद ज़िंदगी के साथ रहूँ।”
"पता है तुम्हें पाँव के नीचे ज़मीन है,
ठोकरें दर्द को लगती है,
दर्द दिल को ढूँढ़ता है,
दिल साँसें ले रहा है,
साँसें मेरी आवाज़ में धुन सुन रही है,
धुन मेरे मन के पास गई है,
मन दिमाग चला रहा है,
दिमाग दिल में जाग रहा है,
दिल आत्मा के पास है,
आत्मा सो रही है,
सोते ही सपने देख कर कह रही है—तू ख़ामोश क्यों है,
ये मत कर, ख़ुद को भूल जाएगा,
तू काम कर रहा है,
मैं काम में व्यस्त हूँ,
अब ठोकरों से गिर गया,
फिर कहता हूँ—अस्त-व्यस्त रहो,
ये कुछ नया नहीं है,
तुम कर लोगे,
पर वो होगा नहीं।”
"जा रहा हूँ, तुम लौट आना,
बीच में ही ज़िंदगी को आधा-आधा कर लेंगे,
याद है ना, कोशिश में बहुत तड़पोगे।”
"लौट आओ, नहीं तुम नहीं,
वो एक बार में ही मान गया,
थोड़ा ठहर, ये ज़िंदगी हर क्षण में ही एक क्षण को बदलेगी,
तब तू ही तरसेगा,
लौट आओ, ज़रूरी नहीं कि क़ाबिल होकर जाए।”
"बहुत जाने-पहचाने हो, मालिक वो ही है क्या तुम्हारा भी,
मैं तो बस छोड़ देता हूँ, बस उसके साथ चला जाता हूँ,
और आते वक़्त खाली रहता हूँ ताकि अपना ख़याल रख लूँ।”
- ललित दाधीच


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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