_ये क्या अजीबी है,
कोई मतलबी,
कोई मासूम,
कोई कुछ नहीं,
ये तो वही अजनबी है।
मैं तराशने पर आ जाऊँ,
तो सारे जहां को,
मेरे तय समय की खुशियों को देना पड़ता।
फ़ासले चाहे किसी के भी हो,
कहीं के भी हो,
वो पास के वो निजी तरंगों में ही,
अपनी हिस्सेदारी अपनी कमजोरी,
अपनी दूरियों को देखते हैं,
और इसको हमने पूरा कर दिया। _
- ललित दाधीच


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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