"एकांत परम सुख है"
जब संसार के कोलाहल से,
मन मेरा घबराता है।
जब झूठे संबंधों का भार,
हृदय को बोझिल कर जाता है।
जब अपने ही प्रश्न बनकर,
अंतर में शूल चुभाते हैं।
तब एकांत के शांत क्षण,
मुझको अपने पास बुलाते हैं।
एकांत मुझे प्रिय लगता है,
यह मन का सच्चा मीत है।
इसके निर्मल आँचल में,
अद्भुत शांति समाहित है।
न कोई छल, न कोई कपट,
न वचनों का व्यापार यहाँ।
मन जैसा है, वैसा रहता,
नहीं दिखावे का संसार यहाँ।
नहीं चाहिए भीड़ मुझे,
न यश का कोई अभिमान चाहिए।
न झूठी प्रशंसा के स्वर,
न संबंधों का व्यवधान चाहिए।
बस कुछ क्षण अपने संग बैठूँ,
अपने मन की बात सुनूँ।
अंतर में जो पीड़ा छिपी है,
उसको समझूँ, उसको बुनूँ।
एकांत की नीरव बेला में,
जब संध्या दीप जलाती है।
पश्चिम के आकाश में लालिमा,
धीरे-धीरे घुल जाती है।
पंछी अपने नीड़ में लौटें,
थककर दिन भी सो जाता है।
तब शांत धरा का कण-कण,
अनुपम गीत सुनाता है।
चंद्रमा की शीतल किरणें,
जब आँगन में उतरती हैं।
तारों की झिलमिल छाया में,
भावनाएँ नई निखरती हैं।
उस निश्छल, निर्मल वातावरण में,
मन का बोझ उतर जाता है।
जग से दूर, स्वयं के निकट,
जीवन सुंदर हो जाता है।
एकांत कोई रिक्त भवन नहीं,
न सूना पथ, न वीराना है।
यह तो अपने ही अंतर्मन का,
अद्भुत और पावन खजाना है।
यहाँ विचारों की सरिता बहती,
यहाँ विवेक का उदय होता।
यहाँ स्वयं से मिलकर मानव,
अपने सत्य से परिचित होता।
भीड़ सदा उत्सव दिखलाती,
पर मन की सुनती कौन यहाँ?
हँसते मुख के पीछे छिपी,
पीड़ा को समझता कौन यहाँ?
जग तो केवल रूप निहारता,
अंतर का संताप नहीं।
एकांत हृदय को पढ़ लेता है,
इससे सच्चा मित्र नहीं।
जब मन में आशाएँ टूटें,
जब सपनों पर धूल जमे।
जब विश्वासों के दीपक पर,
निराशाओं के मेघ थमें।
तब एकांत की गोद में बैठकर,
आँसू भी मोती बनते हैं।
बिखरे हुए हृदय के टुकड़े,
धीरे-धीरे जुड़ते हैं।
यहाँ न किसी से जीतने की,
न किसी को हराने की चाह।
न दूसरों से आगे बढ़ने की,
न पाने की कोई अथाह थाह।
केवल अपने दोष सुधारूँ,
अपने गुण पहचान सकूँ।
जो सत्य छिपा है भीतर मेरे,
उस सत्य को मैं जान सकूँ।
एकांत मुझे सिखलाता है,
धैर्य धरो, मत हारो तुम।
समय बदलता रहता प्रतिपल,
व्यर्थ न आँसू ढारो तुम।
जिसने दुःख को समझ लिया है,
वह सुख का मूल्य जानता है।
जो अपने मन में दीप जलाए,
वह तम में भी पथ पहचानता है।
यहाँ प्रकृति गुरु बन जाती,
पत्तों से उपदेश मिलता है।
नदियों की अविरल धारा से,
चलने का संदेश मिलता है।
पर्वत सिखलाते हैं हमको,
अडिग रहो प्रतिकूल समय में।
फूल बताते हैं मुस्काना,
काँटों से भरे हुए पथ में।
वृक्ष बिना कुछ माँगे देते,
छाया, फल और प्राणवायु।
धरती सबका भार सँभाले,
सहती रहती शीत और वायु।
प्रकृति की इस मौन साधना से,
मन में भाव उदार जगे।
एकांत के पावन क्षण में,
जीवन के नव द्वार खुलें।
जब इच्छाओं का जाल बिछे,
जब मन में तृष्णा बढ़ती जाए।
जब पाने की दौड़ निरंतर,
मानव को व्याकुल कर जाए।
तब एकांत पुकारे धीरे,
अपने भीतर झाँको तुम।
कितना पाया, कितना खोया,
इसका लेखा आँको तुम।
सुख केवल साधन में कब है,
सुख केवल धनवानों में कब है?
सुख केवल ऊँचे भवनों में,
या जग के सम्मान में कब है?
सुख तो निर्मल मन में बसता,
संतोषी व्यवहार में है।
जो स्वयं से संतुष्ट हो गया,
सुख उसके ही संसार में है।
एकांत में जब ध्यान लगाऊँ,
श्वासों का संगीत सुनूँ।
मन की चंचल गति को रोकूँ,
अंतर की हर रीत चुनूँ।
धीरे-धीरे मौन उतरता,
चित्त निर्मल हो जाता है।
जैसे वर्षा के जल से धुलकर,
आकाश उज्ज्वल हो जाता है।
न कोई इच्छा मुझे सताए,
न भविष्य का भय घेरे।
न अतीत की स्मृतियाँ आकर,
वर्तमान से मन को फेरें।
बस इस पल में जीना सीखूँ,
हर क्षण का सम्मान करूँ।
अपने मन की शुद्धि के हित,
निज अंतस का ध्यान धरूँ।
पर एकांत का अर्थ नहीं है,
जग से नाता तोड़ लेना।
अपने कर्तव्यों से बचकर,
केवल अपने में खो लेना।
एकांत तो वह शक्ति है,
जो जीवन को दिशा दिखाता।
मन को निर्मल करके मानव,
फिर से जग के बीच लाता।
जो एकांत में स्वयं सँवरता,
वह जग में प्रेम लुटाता है।
जो अपने अंतर को जीत चुका,
वह सबको गले लगाता है।
जिसके भीतर शांति बसी हो,
वह कटु वचन नहीं कहता।
दूसरों के दुःख को समझे,
किसी का हृदय नहीं दुखाता।
मुझे चाहिए वह एकांत,
जहाँ विचार पवित्र बनें।
जहाँ हृदय के सूखे उपवन,
प्रेम-सुधा से पुनः सजें।
जहाँ अहंकार गलकर बह जाए,
जहाँ करुणा का वास रहे।
जहाँ सत्य मेरा पथप्रदर्शक,
और विवेक मेरे पास रहे।
मुझे चाहिए वह नीरवता,
जिसमें आत्मा गान करे।
मन के मंदिर में बैठा साधक,
निज चेतना का ध्यान करे।
जहाँ न द्वेष रहे, न ईर्ष्या,
न अभिमान का भार रहे।
केवल प्रेम, दया और मैत्री,
जीवन का श्रृंगार रहे।
जग के मेले आते-जाते,
सुख-दुःख के दिन ढल जाते हैं।
समय के निर्मम प्रवाह में,
सब दृश्य बदल जाते हैं।
पर जो अपने अंतर्मन में,
शांति का दीप जलाता है।
वह विपरीत परिस्थितियों में भी,
अपना धैर्य बचाता है।
इसलिए एकांत प्रिय है मुझको,
इसमें आत्मा मुस्काती है।
मौन साधना के पथ पर चलकर,
चेतना नई ऊँचाई पाती है।
यह मेरे जीवन का धन है,
यह मेरी अंतर-ज्योति है।
यह मन की निर्मल गंगा है,
यह सुख की अमर ज्योति है।
नहीं एकांत उदासी का नाम,
न यह जीवन से पलायन है।
यह स्वयं को पहचानने का,
एक पवित्र साधन है।
जो इस सत्य को समझ गया,
वह जीवन में सुख पाएगा।
अपने भीतर झाँककर देखे,
निज अस्तित्व को जान जाएगा।
जब अंतिम पहर की नीरवता में,
मन का प्रत्येक स्वर सो जाए।
जब जग की सारी आकांक्षाएँ,
क्षण भर को मौन हो जाएँ।
तब अंतर की गहराई में,
एक दिव्य अनुभूति जगती है।
एकांत की पावन गोद में,
आत्मा परम शांति पाती है।
नहीं चाहिए सुख का प्रदर्शन,
न वैभव का विस्तार मुझे।
अपने मन में शांति मिले बस,
इतना ही उपहार मुझे।
एकांत मेरा मित्र परम है,
यह मेरा विश्वास है।
जिसने स्वयं को जान लिया,
उसके लिए एकांत ही,
परम सुख का आभास है।
रचनाकार- पल्लवी श्रीवास्तव
ममरखा, अरेराज, पूर्वी चम्पारण (बिहार)


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







