भारतीय विवाह केवल दो व्यक्तियों का साथ नहीं, बल्कि दो परिवारों का सामाजिक और सांस्कृतिक संबंध माना जाता है। इस पूरे संस्कार में एक विशेष रस्म होती है — कन्यादान। सामान्यतः इसे पिता द्वारा अपनी पुत्री को वर को समर्पित करने की पवित्र प्रक्रिया के रूप में देखा जाता है। सदियों से यह मान्यता रही है कि बेटी विवाह के बाद नए घर की हो जाती है और माता-पिता अपनी जिम्मेदारी पूर्ण करके उसे विदा करते हैं। इसलिए कन्यादान को पुण्य कर्म माना गया, मानो पिता अपनी सबसे प्रिय वस्तु का दान कर रहा हो।
किन्तु यदि इस परंपरा को केवल धार्मिक अनुष्ठान मानकर छोड़ दिया जाए तो उसका आधा अर्थ ही समझ में आता है। वस्तुतः कन्यादान किसी वस्तु का दान नहीं, बल्कि विश्वास का हस्तांतरण है। पिता अपनी बेटी को किसी को “दे” नहीं रहा होता, बल्कि उस व्यक्ति पर भरोसा कर रहा होता है कि वह अब उसकी बेटी की सुरक्षा, सम्मान और भावनाओं की रक्षा करेगा। यह क्षण अधिकार त्यागने का नहीं, जिम्मेदारी साझा करने का होता है। माता-पिता अपनी भूमिका समाप्त नहीं करते, बल्कि एक नए परिवार को उसमें सहभागी बना देते हैं।
समाज बदलने के साथ इस रस्म की व्याख्या भी बदल रही है। आज बेटी को संपत्ति या पराया धन मानने की सोच कमजोर हुई है। वह शिक्षित है, आत्मनिर्भर है और अपने निर्णय स्वयं लेने में सक्षम है। ऐसे में कन्यादान का वास्तविक अर्थ “दान” से अधिक “आशीर्वाद” बन जाता है। आधुनिक दृष्टि में यह स्वीकार किया जा रहा है कि विवाह के बाद भी बेटी अपने माता-पिता की उतनी ही रहती है जितनी पहले थी; केवल उसके जीवन का दायरा विस्तृत हो जाता है। इसलिए कई स्थानों पर अब माता-पिता दोनों मिलकर यह रस्म करते हैं, और कहीं-कहीं इसे “कन्याअनुमति” या “कन्यासम्मान” जैसे भावों से भी जोड़ा जा रहा है।
अतः कन्यादान को केवल परंपरा या केवल पुरानी सोच मानना उचित नहीं। यह एक सांस्कृतिक प्रतीक है, जिसका वास्तविक अर्थ समय के साथ परिपक्व हुआ है। आज इसकी सार्थकता तब है जब इसे बेटी की गरिमा, उसकी इच्छा और उसके व्यक्तित्व के सम्मान के साथ समझा जाए। जब दान की भावना समाप्त होकर साझेदारी की भावना उत्पन्न होती है, तभी यह रस्म सच में पवित्र बनती है।
कवि प्रशांत सोऊ जोधपुर राजस्थान
द्वारा रचित


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