🌸"स्वयं से साक्षात्कार"🌸
आज स्वयं से मिलने की अभिलाषा जागी,
अंतर्मन में दबी हुई एक पुकार जागी।
जग को समझते-समझते जीवन बीत गया,
पर स्वयं को जानने का प्रश्न शेष रह गया।
निस्तब्ध रात्रि में जब स्वयं के समीप आई,
मन के कोने में छिपा एक सत्य नज़र आया।
मुख पर हँसी थी, हृदय में वेदना अपार,
कितना कुछ सहता रहा यह मन निराधार।
औरों की प्रसन्नता में स्वयं को भुलाई,
सबको अपना बनाई, स्वयं से परायापन पाई।
जिन स्वप्नों को कभी आँखों में सजाई थी,
उन्हें कर्तव्यों की धूल में कहीं दबाई थी।
आज अंतर्मन से मैंने कुछ प्रश्न किए,
क्यों अपने ही सुख-दुःख सबसे गुप्त किए?
क्यों जग की दृष्टि में उत्तम बनने की चाह में,
स्वयं को खो दिया दूसरों की प्रशंसा की राह में?
तब अंतर्मन ने मंद स्वर में समझाया,
“तूने जग को जाना, स्वयं को न अपनाया।
जिस शांति को खोजता रहा संसार के पार,
वह तेरे ही भीतर थी, तेरे हृदय के द्वार।”
उस क्षण अश्रुओं ने मौन भाषा में कहा,
जो बीत गया, उसे अब बीत जाने दे।
स्वयं के प्रति भी थोड़ा स्नेह जगा,
अपने टूटे हुए स्वप्नों को फिर मुस्कराने दे।
अब न जग से कोई शिकायत,
न स्वयं से विरोध, न हृदय में ईर्ष्या,
न विचारों में अवरोध।
स्वयं को स्वीकारना ही जीवन का सार है,
अपने ही अंतर्मन में छिपा सच्चा संसार है।
आज स्वयं से मिलकर यह बोध हुआ,
मेरा मौन ही मेरा सबसे निकट संवाद हुआ।
जिसे खोजती रही मैं समस्त संसार में,
वह बैठा था चिरकाल से मेरे ही अंतःकरण में।
अब यात्रा जग को जीतने की नहीं,
स्वयं को पाने की है,
यह जीवन किसी और का नहीं,
अपने अस्तित्व को अपनाने की है।
रचनाकार-पल्लवी श्रीवास्तव
ममरखा, अरेराज, पूर्वी चम्पारण (बिहार)


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







