"प्रिय स्त्री"
तुम मर्द चुनना,..
जो अमीर हो।
इतना अमीर
कि तुम्हारी इज़्ज़त करना जाने,
तुम्हारे मौन को भी समझे,
और तुम्हारे रूठ जाने पर
तुम्हें मनाना जाने।
जो इतना अमीर हो
कि तुम्हारी हिम्मत टूट जाने पर
तुम्हारी ढाल बन सके,
तुम्हारी हँसी की वजह बने
और तुम्हारे संघर्षों में
तुम्हारा कंधा बन सके।
जो इतना अमीर हो
कि तुम्हारी ऊँचाई से जले नहीं,
तुम्हारी काबिलियत को देखकर
मुस्कुराए, गर्व करे,
और हर रिश्ते के बीच में
तुम्हारी गरिमा को सर्वोपरि रखे।
जो इतना दिल का अमीर हो
कि तुम्हारी आज़ादी को बंधन न समझे,
तुम्हारी राय को अहमियत दे,
और तुम्हारे हिस्से की धूप में
खुद छाँव बनकर खड़ा रहे।
जो इतना विशाल हृदय हो,
कि तुम्हारी थकावट को भी भांप ले,
तुम्हारी हर छोटी चाहत को
बिना माँगे ही समझ ले,
और मुश्किल से मुश्किल राह में भी,
तुम्हारा हाथ कसकर थामे रखे।
ना चुनना तुम वो,
जो बात-बात पर तुम्हें नीचा दिखाए,
ना चुनना वो,
जो अपनी नाकामियों का बोझ
तुम पर लाद दे।
ना चुनना तुम वो
जो तुम्हारे अतीत का हिसाब माँगे,
ना चुनना वो
जो तुम्हारी उड़ान को
अपनी सहूलियत तक ही नापे।
ना चुनना तुम वो,
जो तुम्हें अपनी पसंद के सांचे में ढाले,
ना चुनना वो,
जो तुम्हारे अस्तित्व को मिटाकर
तुम्हें अपनी पहचान दे।
स्त्री, तुम मर्द अमीर चुनना,..
धन और रुतबे से नहीं,
संस्कारों से,
मन से!
रचनाकार- पल्लवी श्रीवास्तव
ममरखा, अरेराज, पूर्वी चम्पारण (बिहार)


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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