युग युगों से सूरज सुबह खुद निकलता है
और शाम होने पर वो अपने आप ढलता है
सिफर से ज्यादा कुछ नहीं हैं हम जहाँ में
हम रहें ना रहें इस दुनिया का काम चलता है
बहक गया है अगर कारवाँ का मुखिया खुद
सफर का सारा ही किस्सा तमाम लगता है
बोलते हैं बहुत कुछ लोग आज महफ़िल में
पर खिलाड़ी का पता पीने के बाद लगता है
बेवजह अकड़ता है तानाशाह की माफिक
चेहरे मोहरे से वो सचमुच गुलाम लगता है
दास अपने नाम से जो भी लिख रहें हैं आप
किसी नामचीन शायर का कलाम लगता है. .


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







