Dastan-E-Shayara By Reena Kumari Prajapat

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The Flower of WordThe Flower of Word by Vedvyas Mishra
The Flower of WordThe novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas MishraThe Flower of Word by Vedvyas Mishra
Dastan-E-Shayara By Reena Kumari Prajapat

Dastan-E-Shayara By Reena Kumari Prajapat

The novel 'Nevla' (The Mongoose), written by Vedvyas Mishra, presents a fierce character—Mangus Mama (Uncle Mongoose)—to highlight that the root cause of crime lies in the lack of willpower to properly uphold moral, judicial, and political systems...The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra

कविता की खुँटी

                    

सहकर्मी का धर्म

शतरंज का शौकीन नहीं था वह,
मगर मोहरे चल रहा था...
और मैं,
उसे अपना सहकर्मी समझकर
हर चाल में उसका साथ निभा रहा था।

मुझे लगा,
यह बिसात नहीं, विश्वास है,
यह खेल नहीं, साथ है,
हम दोनों एक ही सफ़र के मुसाफ़िर हैं,
बस रास्ते में कुछ मतभेदों की रात है।

वह हर चाल में
कुछ पाने की कोशिश करता रहा,
मैं हर मोड़ पर
रिश्ते बचाने की कोशिश करता रहा।

उसे अपनी जीत प्यारी थी,
मुझे सहकर्मिता का मान,
वह हिसाब रखता रहा चालों का,
मैं रखता रहा व्यवहार का सम्मान।

फ़र्क़ बस इतना-सा था हम दोनों में
वह मोहरों की क़ीमत जानता था,
मैं भावनाओं का मोल समझता था।
वह बिसात पर आगे बढ़ता रहा,
मैं रिश्तों में पीछे हटता रहा।

न उसने कभी कहा कि यह खेल है,
न मैंने कभी सोचा कि यह चाल है,
मैं तो बस अपना धर्म निभाता रहा,
मुझे क्या पता था—
मेरी सहजता ही उसकी
सबसे आसान चाल है।

आज भी कोई पूछे
कि उस खेल में हारा कौन था,
तो मैं बस इतना कहूँगा—

वह शायद अपनी बाज़ी जीत गया,
मगर मेरा विश्वास हार गया।

और सच कहूँ,
तो अफ़सोस उसकी जीत का नहीं,
दुःख इस बात का है
कि जिसे मैंने सहकर्मी समझा,
उसे ,मुझे इंसान समझने में भी
इतनी देर क्यों लगी...

क्योंकि—
मोहरे चलना उसकी कला थी,
और साथ निभाना मेरा धर्म।
वह खेल समझकर चलता रहा,
मैं संबंध समझकर...

वह शतरंज खेल रहा था,
और मैं इंसानियत निभा रहा था।

डॉ. अखिलेश श्रीवास्तव




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