ज़िस्म-रूह सब बहुत चुकी गहरी नींद में सोना हैं
तेरी सीने सें लग के मेरी जान बस तुझमें खोना है
तुझें कभी कहें ही नहीं मैंने,मेरे अहसास क्या थे
हर ग़म सें हारकर तेरी बाहों में ज़ार-ज़ार रोना हैं
एक आखिरी ख्वाहिश जो कह न पाई रवायत में
मेरी जान मुझें तेरे हाथों सें मिट्टी में दफन होना हैं
एक उम्र हुई मुझें रोते,बिलखते,तड़पते,सहते हुए
क्यूँ मेरे मुक़द्दर में लिखा ये भयावह जादू-टोना हैं
उम्मीदों के दिए जलने सें पहले ही बुझ गए जानाँ
खैर आखिर में कुछ भी करके यहीं तो सब होना हैं
कृष्णा क्या ग़ुमान करे हम, कुछ भी हाथ में नहीं
ये मुक़द्दर ये लकीरें सब उपरवाले का खिलौना है...
-कृष्णा शर्मा


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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