माटी के घरौंदों को ही घर समझा गया अक्सर
सिक्के की खनक को सच समझा गया अक्सर
इश्क का हासिल भी है क्या सिवा बर्बादियों के
बेवफाई के तरानों को सुर समझा गया अक्सर
पराये निकले सारे जिन्हें करीबी अपना माना है
वही तो अपने थे जिन्हें गैर समझा गया अक्सर
बहारों ने लूटा खुद चमन अब ये राज खुल गया
वही जाँबाज थे जिन्हें कांटे समझा गया अक्सर
अपना या पराया क्या गर दुनियां ही छलावा है
आग के दरिया को कमतर समझा गया अक्सर
नहीं दो गज जमीं है नसीब उन्ही को आज देखो
जिस शहंशाह को ही खुदा समझा गया अक्सर
मेरी किस्मत का रुख भी दास कितना है अजीब
हमारी तारीफ को भी गिला समझा गया अक्सर. .


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







