बनने में जो खुशी होती है वो बिगाड़ने में नहीं होती है।
संसार चाहे एक बार में सब खत्म कर सकता है, पर बार बार खत्म करना अच्छा नहीं लगता है।
इसलिए थोड़ा थोड़ा खत्म होता है थोड़ा साथ ही बनता जाता है।
ब्रह्मांड है, ब्रह्मांड में धरती, धरती में दुनिया में इंसान,और जिंदगी और इंसान में मन,
मन में ब्रह्मांड, इंसान में मन नहीं ब्रह्मांड है, क्योंकि इंसान सशरीर पूरा ब्रह्मांड नहीं देख सकता है, पर स्वयं का भीतर देख सकता है,और जब खुद के मन यानी ब्रह्मांड को देखता है तो वह वास्तव में सम्पूर्ण ब्रह्मांड को देखता है, मन प्रकृति मतलब ब्रह्मांड की प्रकृति है।
- ललित दाधीच


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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