समाज ने बांट दिया इंसानों को दो हिस्सों में,
क़ैद कर दिया उन्हें चंद कागज़ी क़िस्सों में।
एक को बस वस्तु कहा, दूसरे को कमाने की मशीन बनाया,
इस बनी-बनाई व्यवस्था ने हर मन का सुकून चुराया।
बाहर खटता पुरुष जब घर लौटकर आता है,
अपना कोई घर न पाकर, वो अंदर ही अंदर टूट जाता है।
फिर जनमती है हीन भावना, जो लाचारी से आती है,
और चारदीवारी के अंदर बैठी स्त्री सहज निशाना बन जाती है।
छुपाने से जनमी विकृति, जब शरीर को शक से देखा,
क्यों माता-पिता ने खुलकर न खींची सहज ज्ञान की रेखा?
क्यों एक से पंद्रह साल की वो पावन, निश्चल शांति भुलाई,
जहाँ रटाया गया मृत इतिहास, पर जीना सिखाने वाली शिक्षा न आई।
पर अब वक़्त आ गया है, इस थोपे हुए ज्ञान को ठुकराने का,
अपनी बंद खिड़कियों को खोल, हर सांचे को मिटाने का।
आज से ही माता-पिता के बीच वो बेबाक बातचीत शुरू हो,
विपरीत जेंडर की प्राकृतिक समझ, बिना झिझक के हर दिल में समाए।
महिलाएं खड़ी हों महिलाओं के साथ, बनकर एक-दूजे की ढाल,
और बदले ये सरकारी ढांचा, टूटे ये अंधी व्यवस्था का जाल।
बजट का बड़ा हिस्सा लगे देश की तरक्की, नई खोज और इलाज के क्षेत्र में,
पर सबसे मुख्य बात है—जागे इंसान के भीतर की वो समझ।
जब जागकर हर व्यक्ति कहेगा—"मैं कोई पुर्ज़ा नहीं, मैं इंसान हूँ,
मेरे भीतर उठते जो विचार, मैं खुद उनका चुनने वाला महान हूँ।"
तब तेरा-मेरा भेद मिटेगा, दो पूर्ण इंसानों का संगम होगा,
जीवन का बहाव सहज होगा, हर मोड़ पर अपना रास्ता स्वयं बनाएगा।
ये जीवन एक महा-चक्र है, पूर्णता का यही तो नियम है,
भटककर वापस वहीं आना है, जहाँ असीम शांति और संयम है।
न कोई बंधन, न कोई पिंजरा, बस बहती हुई निर्मल हवाएँ हैं,
"हँसे थे जब गए थे इस दुनिया की भीड़ में,
और आज फिर हँसते हैं जब खुद से वापस मिले हैं।"
- ललित दाधीच


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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