मैंने माँ से करुणा सीखी,
पिता से साहस।
इसलिए आँसू भी मेरे अपने हैं,
और संघर्ष भी।
माँ ने सिखाया—
किसी गिरे हुए को हाथ देना,
पिता ने सिखाया—
गिरकर स्वयं उठ जाना।
माँ ने कहा—
“मनुष्य बनना”,
पिता ने कहा—
“मजबूत बनना”।
इसलिए जीवन ने जब भी
दो राहें रखीं—
एक आसान,
एक सही,
मैंने अक्सर
सही राह चुनी।
क्योंकि माँ ने सिखाया था
किसी का हक़ मत छीनना,
और पिता ने सिखाया था
अपने हक़ से पीछे मत हटना।
माँ ने सिखाया
मनुष्य को उसके दुःख से देखना,
पिता ने सिखाया
मनुष्य को उसके कर्म से देखना।
एक ने हृदय दिया,
एक ने विवेक।
और जीवन को
दोनों की आवश्यकता थी।
मैंने माँ को
बारिश में भीगते पौधों की चिंता करते देखा,
और पिता को
तूफ़ान में खड़े पेड़ों की।
माँ कोमलता की भाषा जानती थी,
पिता दृढ़ता की।
और मैं—
दोनों भाषाओं की विद्यार्थी हूँ।
अब जब कोई मुझे चोट पहुँचाता है,
मैं माँ की तरह उसे समझने का प्रयास करती हूँ,
और पिता की तरह
आवश्यक हो तो उससे दूरी भी बना लेती हूँ।
माँ ने मुझे बताया—
मनुष्य की पहचान उसके व्यवहार से होती है।
पिता ने बताया—
मनुष्य की पहचान उसके धैर्य से होती है।
और मैंने देखा—
दोनों सच थे।
मैंने माँ को
अपने हिस्से की मिठाई छोड़ते देखा,
पिता को
अपनी इच्छाएँ टालते देखा।
एक ने त्याग को जिया,
एक ने उत्तरदायित्व को।
दोनों ने कभी
अपने संघर्षों का बखान नहीं किया।
शायद महान लोग
अपने दुःख नहीं सुनाते,
अपने कर्म सुनाते हैं।
आज जो कुछ हूँ,
वह किसी एक दिन का चमत्कार नहीं,
दो साधारण लोगों की
असाधारण तपस्या का परिणाम हूँ।
मेरी करुणा में
माँ की सदियों पुरानी प्रार्थनाएँ हैं,
मेरे साहस में
पिता के अनकहे संघर्ष हैं।
जब मैं किसी रोते हुए को देखकर
रुक जाती हूँ,
माँ मुस्कुराती है।
जब मैं अन्याय के सामने
झुकती नहीं,
पिता मुस्कुराते हैं।
मैंने विरासत में
कोई महल नहीं पाया,
पर एक ऐसा हृदय पाया
जो कठोर होकर भी दयालु रह सकता है।
मैंने कोई ताज नहीं पाया,
पर ऐसी रीढ़ पाई
जो अकेली होकर भी सीधी रह सकती है।
अब समझती हूँ—
माँ ने मुझे उड़ना नहीं सिखाया,
उन्होंने पंखों में प्रेम भरा।
पिता ने मुझे चलना नहीं सिखाया,
उन्होंने पैरों में विश्वास भरा।
इसलिए मैं जब गिरती हूँ,
टूटती नहीं।
और जब जीतती हूँ,
अहंकार में नहीं डूबती।
क्योंकि मेरे भीतर
माँ की विनम्रता पहरा देती है,
और पिता का स्वाभिमान प्रहरी बनकर खड़ा रहता है।
मैं दोनों की संतान हूँ।
मैं करुणा की कमजोरी नहीं,
साहस की कठोरता नहीं।
मैं वह संगम हूँ
जहाँ दया भी निर्भय है,
और शक्ति भी नम्र।
मैं नदी भी हूँ,
मैं पर्वत भी हूँ।
मैं चाँदनी भी हूँ,
मैं धूप भी हूँ।
अब जब लोग पूछते हैं—
“तुम्हारी सबसे बड़ी उपलब्धि क्या है?”
मैं अपने पद, अपनी शिक्षा, अपने पुरस्कार नहीं गिनाती।
मैं बस मन ही मन कहती हूँ—
यदि कठिन समय में भी
मेरी करुणा जीवित है,
और सफलता के समय भी
मेरा विनम्र साहस जीवित है,
तो यही मेरी सबसे बड़ी उपलब्धि है।
क्योंकि मैं केवल जीवन नहीं जी रही,
मैं दो महान आत्माओं की विरासत को
अपने आचरण में आगे बढ़ा रही हूँ।
मैं अपनी माँ की करुणा का भविष्य हूँ,
मैं अपने पिता के साहस का अगला अध्याय हूँ।
और शायद इसी का नाम है— विरासत।


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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