जीवन की आपाधापी में,
कब शाम हुई, पता नहीं।
सपनों की गठरी कंधों पर थी,
कब उम्र ढली, पता नहीं।
सुबह-सुबह जो निकले थे हम,
कुछ पाने की अभिलाषा में,
राहों ने इतना रोक लिया,
घर छूट गया परिभाषा में।
रिश्तों की गर्म हथेलियों से,
कब छूटे हाथ , पता नहीं।
माँ की आँखों का वह आँचल,
बाबुल की मीठी सीख कहीं,
बच्चों की खिलखिल हँसी सिमटकर,
रह गई तस्वीरों में यहीं।
अपने ही आँगन की चौखट पर,
कब धूल जमी, पता नहीं।
दौलत के ऊँचे पर्वत चढ़े,
मन का आकाश मगर सूना,
भीड़ बहुत थी चारों ओर,
फिर भी भीतर था एक खाली कोना।
हँसते-हँसते आँखों में,
कब नमी बसी, पता नहीं।
कुछ ख़त लिखने बाकी थे,
कुछ "कैसे हो?" भी कहना था,
कुछ सपनों को जी लेना था,
कुछ अपनों संग रहना था।
कल की ख़ातिर आज लुटाया,
कब आज गया, पता नहीं।
अब जब साँझ उतर आई है,
सूरज थका-सा मुस्काता है,
जीवन का सारा शोर समेटे,
मन ख़ुद से मिलने आता है।
तब लगता है—
जिसे खोजते रहे उम्र भर,
वह तो अपने भीतर ही था;
हम ही उससे दूर रहे,
यह बात समझी., पता नहीं।
चलो, अभी भी देर नहीं है,
थोड़ा ठहरें, थोड़ा जिएँ,
दो मीठे बोल किसी को दे दें,
कुछ आँसू भी साथ पिएँ।
यही कमाई साथ चलेगी,
बाकी सब यहीं रह जाएगा—
जीवन की इस आपाधापी में
बस प्रेम अमर रह जाएगा।


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







