मनुष्य को जिंदगी की जरूरत है,
जिंदगी को जरूरत ही नहीं है,
क्योंकि जिंदगी को तो हर बार जिंदगी जीना है,
बार बार कहाँ रुकी है,
सब जीना चाहते हैं,
अलग अलग तरीकों से,
कोई बेचैनी से जिएं,
चाहे उदासी,
संतुलन,
खुश, शंकित, साक्षी या,
जी कर भी ना जिए,
पर जिए,
लेकिन जिंदगी जीती है,
चाहे कोई जिएं,
ना जिएं,
कैसे भी,
ना वैसे भी,
अतः जिंदगी जरूरत पर नहीं,
जीने पर चलती हैं,
अथाह लगातार,
जिंदगी,
और सब में,
बस उसका आराम या नींद लेना,
मौत है,
क्योंकि कुछ, हर चीज काम करके,
आराम करती है,
तो जिंदगी का आराम,
या नींद लेना,
मौत है,
जो फिर जिंदगी के सपने देखकर,
फिर हकीकत जिंदगी होती है,
मौत नींद, सपने, आराम है
और जिंदगी काम, होना, गतिविधियों,
का वस्तुगत रूप है,
काम फिर आराम सब करते हैं,
कोई जिंदगी कहे,
कोई मौत कहे,
होता रहता है।
- ललित दाधीच


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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