करो जंग,
जंग करो,
समय होगा इतना,
होगा ही इतना,
समय खाली रहता इसके लिए,
एक एक क्षण कहाँ जल्दी अधूरा निकलता है,
जंग में तो पूरा एक पल ले दे के जाता है,
प्रभाव,
उसका तो बखान ही मत करो,
पूरी जिंदगी क्या सबकी जिंदगी लग जाती है,
कौन बख्शता है,
कौन बचता है,
ना जाने कौन जंग करते हैं,
क्या करते पता नहीं जंग में,
और सब लपेटे में आते हैं,
क्या मतलब,
पर समय होगा इतना,
तो हो जंग,
जंग हो,
सारा समय भागकर,
और जिंदगी को भगाकर,
सबको जंग में ही तो लाते हैं,
क्या जंग है,
जग को जंग लगा बैठी है,
खाए जा रही है,
कोई पाचन का कहीं अता पता ही नहीं,
कौन करता है,
इसका भोग,
पता ही नहीं इसका पेट भरता है ही नहीं,,
या भरता है या पाचन होता तो,
वापिस जंग करता है,
करवाता है,
समय ही होगा,
शायद समय को खुद समय इसके लिए,
समझ से परे है जंग,
जंग के लिए समय भी,
और इसमें लगने वाले,
बेकार त्याग जिंदगी का।
- ललित दाधीच


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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