कोई बात बाक़ी न रही यहाँ कोई रात बाक़ी न रही
समेट ले सारे ज़ज़्बात को कोई आस बाक़ी न रही
इस क़दर फर्ज़ थोप दिया गया तमाम हिस्से में मेरे
वजूद मट्टी हुआ,राख़ में ज़रा भी आग बाक़ी न रही
तमाम क़ानूनी किताबें अपने हक़ की बात करती हैं
माँ-बाप के हक़ के आगे कोई औकात बाक़ी न रही
तमाम खुशियाँ तमाम हक़ फर्ज़ पऱ लुटा दिए हमनें
दामन इतना खाली हुआ, ज़रा खैरात बाक़ी न रही
इश्क़ का फर्ज़ था महबूब की इज़्ज़त सो जुदा हुए
दे आए निशां सारे कदमों के मुलाक़ात बाकी न रही
कृष्णा क़ो हक़ नहीं मुहब्बत का नसीबी ऐसी लिखी
कुचली गई रवायत में मुहब्बत की ज़ात बाक़ी न रही
-कृष्णा शर्मा


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







