अपने भीतर
मैंने एक घर बनाया था—
बहुत पुराना,
जिसकी दीवारों पर
मेरी चुप्पियों की काई जमी थी।
दरवाज़ा भारी था,
फिर भी उसे
कई बार खोला।
किसी के लिए
भीतर पूरा आकाश बुलाया,
किसी के हाथ में
अपनी धड़कनों की चाबी रख दी,
और किसी के सामने
वह कमरा खोल दिया
जहाँ मैं स्वयं से भी
नज़रें चुराकर रहता था।
उन्हें मेज़ पर रखी
अधूरी कविताएँ पढ़ने दीं,
तकिए में छिपे
पुराने आँसू दिखाए,
और वह दर्द भी—
जिसे बरसों
कवि होने का नाम देकर
छिपाए रखा था।
लेकिन—
हर बार
जब कोई गया,
भीतर का कोई फूल
दरवाज़े की चौखट पर
कुचल गया।
मैंने देखा है—
भरोसा भी एक फूल है:
खिलने में एक उम्र लगती है,
रौंदने में एक पल।
इसलिए अब
दरवाज़ा बंद रखता हूँ।
नहीं—
मैं पत्थर नहीं हुआ हूँ।
बस अपनी देहरी पर
किसी के पैरों की आहट
बिना पूछे नहीं आने देता।
फिर भी
दरवाज़ा पूरी तरह
बंद नहीं किया।
उसमें एक
बहुत छोटा-सा छेद छोड़ दिया है—
चाबी का छेद।
शायद इसलिए
कि कोई आए तो
दरवाज़ा तोड़ने की कोशिश न करे,
बस चुपचाप
उस छोटे-से अँधेरे में आँख रखकर
देख ले—
कि इस बंद घर में
अब भी एक आदमी रहता है,
जो प्रेम से डरता है,
मगर प्रेम करना
अब भी नहीं भूला।
जो किसी को
भीतर आने नहीं देता,
मगर हर रात
चाबी के छेद से
बाहर देखता है—
शायद कोई हो
जो दरवाज़ा खोलने नहीं,
सिर्फ़ यह पूछने आया हो—
“तुम अब भी भीतर हो?”
— इक़बाल सिंह ‘राशा’
मनिफिट, जमशेदपुर, झारखण्ड


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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