उनको नहीं थी कद्र-ए-मुहब्बत, कसूरवार मेरी निगाह हो गई..
बाकी न रहा असर-ए-कतरा, वो आज मेरी आह हो गई..।
दहकती थी रौशन-ए-किरन, पैकर-ए-आफ़ताब से..
आज वही शक्ल-ओ-सूरत क्यूं इतनी सियाह हो गई..।
लिए फिरते थे हम, वफ़ा-ए-तस्वीर ज़माने में मगर..
कुछ देखा न सुना, दुनिया उनकी तरफ़ से गवाह हो गई..।
क्या क्या तकलीफें लेकर, ये तिजारत-ए-बाज़ार आया..
ज़िंदगी गुज़री इस तरह, कि बँधी हुई तनख़्वाह हो गई..
इस दिल की ज़मीं पे गुलिस्ताँ थे, बुलबुल-ओ-बहारें थीं..
सय्याद-ए-मंसूबों से, वो दुनिया मेरी शिकार-गाह हो गई..।
पवन कुमार "क्षितिज


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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