एक रात बंद कमरे में,
मैं अंधेरा देख रहा,
लगा कि अंधेरा मुझे देख रहा,
इसलिए कुछ भी नहीं देख पा रहा,
फिर लगा कि मैं ही अंधेरा देख रहा,
तभी अंधेरा कुछ नहीं देख रहा,
शायद यही मैं नहीं समझ रहा,
मैं उन वस्तुओं को देख रहा,
और अंधेरा वस्तुओं समेत सब देख रहा,
इतना कि मुझे भी अंधेरा होने लगा,
रोशनी के पीछे ही तो ये अंधेरा है,
इसलिए अंधेर हो रहा है,
और हर वक़्त कर रहा है,
हो सकता है इतनी चमक के टकराने से,
विरोधाभास में अंधेरा बना हो,
हर रोशनी की छाया है,
जितनी रोशनी उतनी गहन छाया,
उतना गहन अंधेरा है,
ये कला है इसकी,
ये काला भी है,
सभी रंगों को अपने अंदर लेकर फिर भी वही है,
सब कुछ इसी में है,
बस इसके आगे की रोशनी को देखना है,
जैसे इंसान आगे से देखने पर पहचाना जाता है,
पीछे से अनजान लगता है,
इसलिए चेहरा सामने है सबका,
अपनी काबिलियत सामने लाओ,
पीठ पीछे अंधेरा और छाया है,
जिसमें है तो सब पर तुम्हें नहीं दिखेगा,
हमें भी आगे बढ़ना है,
रोशनी आगे होती है,
जैसे हमारे मस्तिष्क में ज्ञानशक्ति होती हैं,
ज्ञानचक्षु हमारे ललाट के शिखर पर हैं,
इंसानी शरीर में नीचे कुछ नहीं है,
आदतें और वही जीवन है जो तुम रोज उठ के करते हो,
पहचान और अस्तित्व के लिए ऊपर आओ,
रोशनी करो मन मस्तिष्क में,
फिर अंधेरा देखो उसके आगे जाओ,
रोशनी मिलेगी,
वहीं से कारवां शुरू है,
रोशनी तो चारों तरफ है,
अंधेरा बस बीच में है,
और हम उस अंधेरे के बीच में है,
इसलिए तन में ऊँचाइयाँ चढ़ कर,
सोचो और सहज होकर,
आगे बढ़ो, आगे बढ़ो
और कुछ रोशनी के दीये लेकर,
गहन अंधेरे को मुक्त करो,
ये कारावास खतम करो,
अंधेरे में रोशनी तुम्हीं थे ये याद रखना,
जैसे मन मजबूत के बाद तन मजबूत होता है,
बस अंधेरे में उचित कदम उठाना,
कोई अंधेरा मत हो जाना। ।
- ललित दाधीच


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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