हास्य -व्यंग्य
अजब भ्रष्टाचार, गजब का शिकार
डॉ.एच सी विपिन कुमार जैन "विख्यात"
अंकी-इंकी-डंकी लाल की, माया बड़ी ही भारी है,
जो भी मिला उसे निगलने की, इनकी पूरी तैयारी है।
कभी स्कूल की छत खा गए, कभी बच्चों का खाना,
इनके पास है लूटने का, हर रोज एक नया बहाना।
अस्पताल की दवाइयाँ भी, इनके घर का पानी हैं,
भ्रष्टाचार के इस नाटक की, ये ही मुख्य कहानी हैं।
सरकारी फाइल पर बैठा, मोटा सा एक चूहा है,
जो रिश्वत न दे उसे, दिखाता केवल धुआँ है।
पेंशन खा गए बुजुर्ग की, और विधवा का सम्मान,
इंसानियत को बेचकर, ये बनते हैं बड़े धनवान।
कुर्सी पर बैठकर ये, बस अपना पेट बढ़ाते हैं,
नदी का बांध भी ये, एक ही घूँट में पी जाते हैं।
बिजली के तार खा गए, और खा गए खंभे भी,
पूछो तो कहते हैं, "हमें लगे थे वो बहुत मीठे भी।"
जनता मांगे जवाब तो, ये फाइलें घुमाते हैं,
अंधेरी कोठरी में बैठकर, बस माल ही बनाते हैं।
ये देश को दीमक की तरह, अंदर से खोखला कर रहे,
झूठ के सुंदर फूलों से, अपना गुलदस्ता भर रहे।
पर याद रखो! जिस दिन ये, जनता का सब्र टूटेगा,
इन भ्रष्टाचारियों का, हर एक निवाला छूटेगा।
लिखना होगा नया इतिहास, जब ये चोर पकड़े जाएंगे,
अपनी काली करतूतों का, फल ये यहीं पर पाएंगे।


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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