Dastan-E-Shayara By Reena Kumari Prajapat

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The Flower of WordThe Flower of Word by Vedvyas Mishra
The Flower of WordThe novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas MishraThe Flower of Word by Vedvyas Mishra
Dastan-E-Shayara By Reena Kumari Prajapat

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The novel 'Nevla' (The Mongoose), written by Vedvyas Mishra, presents a fierce character—Mangus Mama (Uncle Mongoose)—to highlight that the root cause of crime lies in the lack of willpower to properly uphold moral, judicial, and political systems...The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra

कविता की खुँटी

                    

भीड़ के सहयात्री

हम सब चल रहे हैं...
एक ही सड़क पर,
एक ही समय में,
अपने-अपने गंतव्य की ओर।
चेहरों का एक अथाह समंदर है,
कदमों की आवाज़ है,
जल्दी में भागती ज़िंदगी है,
और हर चेहरे के पीछे एक अनकही कहानी है।
कोई घर की ज़िम्मेदारियाँ ढो रहा है,
कोई अपनों के सपनों का बोझ उठाए है,
कोई मुस्कुराकर अपने आँसू छिपा रहा है,
तो कोई भीड़ में चलते हुए भी किसी अपने की तलाश में है।
अजीब है न...
हम रोज़ कितने लोगों से मिलते हैं,
कितने कंधों से टकराते हैं,
कितनी आँखों के सामने से गुज़रते हैं,
मगर कितने लोगों को सचमुच देख पाते हैं?
हम सब एक-दूसरे के सहयात्री हैं,
पर किसी के सफ़र का हिस्सा नहीं बनते।
साथ चलते हैं कुछ दूर तक,
मगर किसी के दर्द के साथ दो कदम भी नहीं चलते।
कभी-कभी सोचता हूँ,
इस भीड़ में सबसे अकेला कौन है?
वह, जिसे कोई पहचानता नहीं,
या वह, जिसे सब पहचानते हैं,
मगर कोई समझता नहीं?
वह, जिसके पास अपना कोई नहीं,
या वह, जिसके अपने तो बहुत हैं,
मगर सुनने वाला कोई नहीं?
शायद अकेलापन लोगों की कमी का नाम नहीं,
किसी एक दिल में अपने लिए जगह न मिलने का नाम है।
काश! हम इतना समझ पाते कि हर कठोर दिखने वाला चेहरा पत्थर नहीं होता,
हर चुप रहने वाला इंसान कमज़ोर नहीं होता,
और हर मुस्कुराता हुआ व्यक्ति भीतर से खुश नहीं होता।
कभी किसी अनजान सहयात्री को एक स्नेहभरी नज़र दे देना,
किसी थके हुए चेहरे से बस इतना पूछ लेना—
“सब ठीक है न?”
हो सकता है,
आपके लिए यह एक छोटा-सा वाक्य हो,
मगर किसी के लिए टूटते हुए दिन का आख़िरी सहारा बन जाए।
आख़िर हम लेकर भी क्या जाएँगे इस भागती हुई ज़िंदगी से?
कुछ यादें,
कुछ रिश्ते,
कुछ अधूरी इच्छाएँ और कुछ लोग,
जिनके जीवन में हम थोड़ी-सी रोशनी बनकर आए थे।
इसलिए अब जब भीड़ में चलूँ,
तो केवल अपना रास्ता न देखूँ,
किसी के लड़खड़ाते कदम भी देखूँ।
क्योंकि मंज़िल तक पहुँच जाना सफ़र की सफलता हो सकती है,
मगर किसी को गिरने से बचा लेना इंसान होने की सार्थकता है।
हम सब भीड़ के सहयात्री हैं,
न कोई हमेशा आगे रहेगा,
न कोई हमेशा पीछे।
आज किसी को हमारी ज़रूरत है,
कल हमें किसी की होगी।
इसलिए चलते रहिए,
मगर इतना तेज़ भी मत चलिए कि पीछे छूटते हुए इंसान की आवाज़ तक सुनाई न दे।
भीड़ का हिस्सा तो हर कोई है,
कोशिश कीजिए—
किसी के सफ़र का एक खूबसूरत एहसास बन सकें।
क्योंकि अंत में लोग यह नहीं याद रखते कि हम उनके साथ कितनी दूर तक चले थे...
वे याद रखते हैं—
जब पूरी दुनिया भीड़ बनकर गुज़र रही थी,
तब कौन था जो एक पल के लिए रुका था,
उनकी आँखों में झाँका था,
और उन्हें यह एहसास दिला गया था—
तुम अकेले नहीं हो,
मैं भी तुम्हारी तरह एक सहयात्री हूँ।”

डॉ. अखिलेश श्रीवास्तव




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